Saturday, 20 August 2016

अब तेरा यहाँ बसर नहीं

ऐ वक़्त तेरी मार भी अब मुझे मयस्सर नहीं
ऐसा लगता है मेरे कांधे पर अब मेरा सर नहीं

मुफ़लिसी का आलम औ" भूख से टूटा बदन
कि खुद की रुक गई सांस मुझे यह ख़बर नहीं

मेरी किस्मत तू चिंगारी से जलकर राख़ हो गई
कि अब यहाँ किसी की दुआ में कोई असर नहीं

जो दिन ढला तो वक़्त भी क्या कमाल कर गया
कि जो मुझको पहचाने यहाँ ऐसी कोई नज़र नहीं

अब तो यहाँ तेरा कोई दुश्मन भी न रहा "धरम"
तू चल कोई और जहाँ अब तेरा यहाँ बसर नहीं

Sunday, 14 August 2016

चंद शेर

1.

जब कज़ा ही मंजिल है "धरम" तो ये मिल ही जाएगी
यकीं मानो ये मंज़िल एक दिन खुद ही चल के आएगी