Sunday, 17 November 2024

किसी रिश्ते का भरम दिखता है

कि आईने में उसका चेहरा कुछ कम दिखता है
उसकी आँखों में झाँको तो कोई वहम दिखता है

दिलजलों की शागिर्दी है उदासी की रहनुमाई है       
कि उसके गिरेबाँ में  हमेशा कोई ग़म दिखता है

कि उसका वो लहज़ा वो सलीक़ा वो तौर-ए-बयाँ   
उसकी बातों में किसी रिश्ते का भरम दिखता है

वो रास्ता उसका था  वो नक़्श-ए-पाँ उसी का था
क्यूँ उस मंज़िल पर कोई और आदम दिखता है

दीवानों की महफ़िल है वहाँ इश्क़ का आलम है   
मगर उस फ़िज़ा में कोई और मौसम दिखता है

महज़ वो एक ही जवाल का ऐसा असर "धरम"         
रास्ता आसाँ ही क्यूँ न हो मगर दुर्गम दिखता है  

Sunday, 10 November 2024

खुल गया है बादबाँ फिर से

सीने में क्यूँ उठ रहा है धुआँ फिर से
क्या कोई दर्द दे रहा है बयाँ फिर से

कि वो ज़ख़्म हो गया है जवाँ फिर से  
लो बदल गया है तर्ज़-ए-बयाँ फिर से

सज़दे में आ गया है आसमाँ फिर से
किसकी छिड़ गई है  दास्ताँ फिर से

देख बिछड़ रहा है  हम-रहाँ फिर से
झोंका से खुल गया है बादबाँ फिर से
  
कर्बला में हो रहा है इम्तिहाँ फिर से 
यहाँ मिटने वाली है हस्तियॉं फिर से

"धरम" घटने लगी है दूरियाँ फिर से  
लो उजड़ने लगी है बस्तियाँ फिर से