प्रथम शिक्षा शिशु माता के गर्भ में ही है पाता
प्रथम गुरु होती है माता
पाकर स्नेह पिता का शिशु गर्भ में है इठलाता
प्रथम गुरु होती है माता
बात अनोखी भेद चक्रव्यूह का
अजन्मा अभिमन्यु कैसे है पाता
प्रथम गुरु होती है माता
पश्चात् जन्म शिशु धरा के संपर्क में है आता
प्रकृति से अनायास ही बहुत कुछ है पाता
प्रथम गुरु होती है माता
छात्र जीवन में विद्यालय की भूमिका है अद्भुत
यहाँ आचार्यों के मार्गदर्शन में शिशु
शिक्षा के सागर में गोता है लगाता
ज्ञान के मोती चुनता
अपने ललाट पर पिरोता
प्रथम गुरु होती है माता
महाविद्यालय के प्रांगण में बन वयस्क जब आता
ज्ञान की महिमा का अनुभव कर गर्वित होता
गुरु के चरणों में शीश नवाता ज्ञान अलौकिक पाता
प्रथम गुरु होती है माता
विश्वविद्यालय के प्रांगण में दर्शन जब उसे भाता
पठन-पाठन के साथ रहस्य शोध के भी पाता
प्रथम गुरु होती है माता
गुरु के मुख से निकली विद्या संग सदा ही रहती
चाहे कोई चुने तपोवन या चुने गृहस्थी
धर्म अधर्म के संकट से भी मिल जाती है मुक्ति
मगर शिक्षा का ऋण यूँ ही नहीं उबरता
माथे पर यह ऋण अगर बच जाये तो
बार बार धरा पर आना है पड़ता
लेकर ब्रह्मराक्षस का रूप
भटकना पड़ता शिष्य की तलाश में
और यह ऋण ज्ञान देकर ही उबरता
प्रथम गुरु होती है माता