Sunday, 1 February 2026

आसमाँ तो अब भी खुला है

आसमाँ को क्या होगा आसमाँ तो अब भी खुला है  
ज़मीं पर लगी किसी आग में कब आसमाँ जला है

हर कोई शक़्ल अपनी आईने में देखो औ" बताओ 
कि ख़ून को पानी में मिलाने को यहाँ कौन तुला है

वो एक शर्त न जाने कितनी शर्तों को साथ लाई थी
न जाने अलावा मेरे और कितनों का होंठ सिला है

ज़िद मत करो वक़्त को अपने हिसाब से ढलने दो  
चलो लौट चलें  कब ख़ुर्शीद वक़्त से पहले ढला है

एक तो तीरगी उसमें  आलम-ए-तन्हाई भी मौज़ूद 
ख़ुद से पूछो कि इसमें हुआ कब किसका भला है
   
न तो वहाँ ज़मीं ही थी "धरम" न तो आसमाँ ही था   
महज़ एक भरम था ज़मीं वहाँ आसमाँ से मिला है

Saturday, 10 January 2026

हालात भी बदलने लगे

जब ईमान बदला तो हालात भी बदलने लगे  
ख़ुद से पूछने वाले सवालात भी बदलने लगे
 
बस एक सवाल था अब्र बराबर क्यूँ न बरसे  
इस पर जुर्म भी किया  बात भी बदलने लगे

फ़िज़ा-ए-उल्फ़त में  तारीक़ी बात घोली गई   
फिर उस बात पर  जज़्बात भी बदलने लगे

कि बात अब हवा पानी रौशनी तक आ गई
बुनियादी सारे  मु'आमलात भी बदलने लगे

पहले तो सर-ए-आम इक़रार-ए-जुर्म कराये
फिर लगाने वाले  दफ़'आत भी बदलने लगे

वहाँ क़िमार-बाज़ की बड़ी लम्बी क़तार थी
बाज़ी आते-आते ता'ज़ीरात भी बदलने लगे

उस शख़्स की "धरम" अब हैसियत देखिए  
उसके इशारे पर दिन-रात भी बदलने लगे

Sunday, 21 December 2025

कितना आसमान आएगा

कि कितनी ज़मीं के हिस्से में  कितना आसमान आएगा  
फ़ैसला उसका भी होगा जो दोनों के दरमियान आएगा

यह बोरिया-बिस्तर औ" यह निवाला सारा यहीं रहने दो 
सफ़र बहुत ही लम्बा है काँधे पर कितना सामान आएगा

शर्त-ए-मोहब्बत  न जाने क्यूँ हमेशा इसी पावंदी में रही
कि दिल में वही उतरेगा  जो सरापा लहू-लुहान आएगा

कभी उधर से गुज़रो जहाँ सिर्फ़ दिल-जलों की तुर्बतें हैं    
वो एहसास होगा कि दिल में न कभी इत्मिनान आएगा

जिधर मंज़िल-ए-'उरूज है उस रास्ते पर नहीं जाना है 
कि उस रास्ते में हर कदम पर लिखा सावधान आएगा

वो गुज़रा ज़माना है 'धरम' अब उसे क्यूँ ही याद करना 
कि ज़ेहन में या तो तारीक़ी आएगी या बयाबान आएगा  

Tuesday, 21 October 2025

रहबर का तमाशा देखिए

सफ़र में निकले हैं रहबर का तमाशा देखिए
मंज़िल फ़तह करने वालों की हताशा देखिए

तख़्त मिलते ही ज़ेहन में जिन्न पैवस्त हो गया
लहू में सना है ये ताज़ कैसे बे-तहाशा देखिए

मंज़िल ख़ुद ही हैरान है कौन उसको खा गया
फ़लक़ की आँखों में छाई यह निराशा देखिए

गूँगों की आवाज़ में आज ऐसी ताक़त आ गई
बहरों के कानों तक पहुँची इर्ति'आशा देखिए

अभी तो उम्र शुरू हुई है हयात पूरी बाक़ी है 
अभी से ज़मीं में गड़ने का मत तहाशा देखिए

इंसानों की जमात है इंसानियत की ही बात है 
सबके ज़ेहन में छुपा 'धरम' एक रा'शा देखिए

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इर्ति'आशा: प्रतिध्वनि
तहाशा : भय / डर
रा'शा : कंपन / थरथराहट

Monday, 13 October 2025

सफ़ीना मस्ती में टहलता है

फ़लक में ख़ुर्शीद पहले की तरह कहाँ निकलता है 
मग़रिब-ओ-मशरिक़ किसी के इशारे पर चलता है
 
ये दिल भी तो अब कहाँ पहले की तरह उबलता है 
सीने में घुसकर  अब कहाँ कोई दिल को मलता है 

उरूज यहाँ ख़ुद ही जवाल की तरफ़ फिसलता है
बशर मंज़िल पाकर अपनी ही हस्ती को छलता है

यहाँ चिलमन शक़्ल  देखकर रंग अपना उगलता है   
आलम-ए-पस-ए-चिलमन है कहाँ कोई संभलता है

माज़ी मौजूदा मुस्तक़बिल एक दूसरे को निगलता है
मगर संगीन कलम को अपनी चुटकी में मसलता है

कि लहरों के चढ़ाव पर सफ़ीना मस्ती में टहलता है 
यह देखकर 'धरम' समंदर अब और भी उछलता है

Monday, 15 September 2025

साज़िश कराई जा रही थी

मरज़ का पता नहीं मगर दवा दी जा रही थी 
कि सर-ए-आम ये बात भी बताई जा रही थी

बात कुछ और थी कलाम किसी और का था   
औ" सूरत किसी और की दिखाई जा रही थी

यहाँ क़त्ल के गुनाह को रहमत बताया गया
हर रोज़ ये कैसी साज़िश कराई जा रही थी
    
महफ़िल में ख़ामोशी वैसी की वैसी ही रही 
कैसे कहें उसके आने से तन्हाई जा रही थी

वो मु'आमला सिर्फ़ दिल का नहीं रहा होगा
क्या जाने वहाँ वो जश्न क्यूँ मनाई जा रही थी

आदमी सिर्फ़ एक ही था लिबास ढेर सारे थे  
औ" फिर सूरत पर सूरत पहनाई जा रही थी

जाने क्यूँ "धरम" बात तू-तू मैं-मैं पर आ गई  
फ़िज़ा में धुलकर सारी आशनाई जा रही थी

Wednesday, 3 September 2025

प्रथम गुरु होती है माता

प्रथम शिक्षा शिशु माता के गर्भ में ही है पाता
प्रथम गुरु होती है माता 
पाकर स्नेह पिता का शिशु गर्भ में है इठलाता 
प्रथम गुरु होती है माता

बात अनोखी भेद चक्रव्यूह का 
अजन्मा अभिमन्यु  कैसे है पाता
प्रथम गुरु होती है माता    

पश्चात् जन्म शिशु धरा के संपर्क में है आता
प्रकृति से अनायास ही बहुत कुछ है पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

छात्र जीवन में विद्यालय की भूमिका है अद्भुत 
यहाँ आचार्यों के मार्गदर्शन में शिशु 
शिक्षा के सागर में गोता है लगाता 
ज्ञान के मोती चुनता 
अपने ललाट पर पिरोता 
प्रथम गुरु होती है माता

महाविद्यालय के प्रांगण में बन वयस्क जब आता 
ज्ञान की महिमा का अनुभव कर गर्वित होता 
गुरु के चरणों में शीश नवाता ज्ञान अलौकिक पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

विश्वविद्यालय के प्रांगण में दर्शन जब उसे भाता 
पठन-पाठन के साथ रहस्य शोध के भी पाता
प्रथम गुरु होती है माता

गुरु के मुख से निकली विद्या संग सदा ही रहती 
चाहे कोई चुने तपोवन या चुने गृहस्थी
धर्म अधर्म के संकट से भी मिल जाती है मुक्ति  

मगर शिक्षा का ऋण यूँ ही नहीं उबरता
माथे पर यह ऋण अगर बच जाये तो  
बार बार धरा पर आना है पड़ता

लेकर ब्रह्मराक्षस का रूप 
भटकना पड़ता शिष्य की तलाश में
और यह ऋण ज्ञान देकर ही उबरता 
प्रथम गुरु होती है माता 

Monday, 11 August 2025

दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

यादों का झोंका कभी सुकूँ से सोने नहीं दिया
कि सलोने सपनों को कभी संजोने नहीं दिया

उसे बुत-ए-मसीहा के अलावा और क्या कहूँ 
वो जो तन्हाई में भी कभी मुझे रोने नहीं दिया

मेरे क़त्ल की गवाही वो ख़ंज़र ख़ुद देता रहा       
कैसा ख़ंज़र था दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

आज महताब नक़ाब में है रात भी शरमाई है  
महफ़िल ने चाँदनी को धूमिल होने नहीं दिया
  
उसका क़तरा पर कभी तो कोई एहसान था  
जो समंदर ने उसे ख़ुद को डुबोने नहीं दिया

अपने साये से बिछड़कर रौशनी खोजता है 
शख़्स जो कभी कोई  सूरज बोने नहीं दिया

दोस्ती की चादर  उसके साथ ओढ़ूँ तो कैसे 
वो तो एक भी सूत "धरम" पिरोने नहीं दिया 

Wednesday, 6 August 2025

गर्दन गुल-पोश है

मसीहा ही क़ातिल है हुक्मरान ख़ामोश है 
कि क़ातिल के लहू में बहुत गरम-जोश है

कभी फूलों को हटाईये गिरेबाँ तो देखिए  
कि बर्षों से तो आपकी गर्दन गुल-पोश है

आप न तो यहाँ आईये न ही दिल लगाईये    
सबकी तबी'अत तो यहाँ ख़ाना-ब-दोश है

कैसा क़र्ज़ है कि रस्म-अदायगी पता नहीं
अब खाली हो चुका अपना वफ़ा-कोश है 
 
पहले नज़दीक आईये फिर हाथ मिलाईये   
कि यहाँ हाथ मिलाना भी एक आग़ोश है

मंज़िल-ए-मक़सूद  जब नज़र में आ गया    
फिर बाद उसके बची ज़िंदगी बे-जोश है

अब क्या बात करें  किससे नज़र मिलायें  
यहाँ सबका चेहरा तो "धरम" रू-पोश है  

Saturday, 19 July 2025

दोनों अरमाँ निगलते हैं

जो लोग मरकर सितारे बनते हैं आसमाँ में मिलते हैं 
वो लोग उस जहाँ में भी एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

सुबह कोई और सूरज था  शाम कोई और सूरज है 
कि ज़मीं हो या हो आसमाँ  दोनों अरमाँ निगलते हैं 

वक़्त ने जो भी मरज दिया मुसलसल बढ़ता ही गया  
कैसे कह दें कि वक़्त के मारे लोग कभी सँभलते हैं

जिन जुगनुओं की उम्मीद पर मैंने चिराग़ बुझा दिया
पता न था वो सारे मेरे दुश्मन के इशारों पर जलते हैं

वो जो सच्चाई है सब को पता है ज़मीं में दफ़्न भी है
लोग किस क़ब्र में गड़ते हैं किस क़ब्र से निकलते हैं 
    
इस बारिश के मौसम में "धरम" दो रंगों के बादल हैं  
दोनों साथ घिरते हैं  दोनों पानी औ" आग उगलते हैं