Tuesday, 20 September 2016

किसने किसको लूटा है

अपने उस अतीत को वहीँ से बनाना है जहाँ से वो टूटा है
आ कि मिल के खोजें रिश्ते का कौन सा हिस्सा ठूठा है

जब से बिछड़े थे तब से अब तक हम दोनों अकेले ही रहे
तन्हा रहने का हम दोनों का ये इल्म भी खूब अनूठा है

मैं जब भी उदास रहा यहीं इसी कमरे में बैठा बाहर न गया
ज़माने से पूछ लो यह कोई न कहेगा की वो तुमसे रूठा है

आरोपों की चादर मैंने समेट ली है अब तुम भी समेट लो
आ दोनों मिलकर ये भूल जाएँ कि कौन कितना झूठा है

ये घर पूरा मेरा है औ" पूरा का पूरा तुम्हारा भी है "धरम"
अब यहाँ क्या हिसाब करना कि किसने किसको लूटा है

Sunday, 18 September 2016

चंद शेर

1.
कुछ तो मिला होगा उस दोनों में तब तो बात बनी होगी
वरना बहुत वजह हैं "धरम" इस ज़माने में बात टूटने की

2.
कहीं कोई सितारा टूटा होगा जो मेरी झोली भर गई
आज मेरी बहुत आरज़ू है "धरम" खुद को लूटने की

3.
उसका किसी पे दिल आया औ" किसी और पे वफ़ा
नतीजा यह है "धरम" की तीनो के साथ हुआ ज़फ़ा

4.
उसके जनाज़े को किसी का कन्धा भी नसीब नहीं हुआ
कि मरने के बाद भी "धरम" कोई उसके क़रीब न हुआ

Thursday, 8 September 2016

नज़र आता है

एक दीवार के पीछे कई और दीवार नज़र आता है
हद-ए-निगाह तक यहाँ सब बीमार नज़र आता है

इस शहर के लोगों को क्या समझूँ कुछ समझ नहीं आता
यहाँ तो हर चौराहे पर मंदिर-औ-मीनार नज़र आता है

कि मंदिर की एक ईंट गिरी मीनार का एक शीशा टूटा
इस बात पर पूरा का पूरा शहर ख़बरदार नज़र आता है

जहाँ भी उठती है एक छोटी सी चिंगारी औ" थोड़ी सी हवा
उस मंज़र को देखने इंसानों का एक बाज़ार नज़र आता है

कि हर कोई दूसरों की मुफलिसी-औ-खुद्दारी पर हँसता है
यहाँ के लोगों में "धरम" ये कैसा आज़ार नज़र आता है