तबी'अत आबरू में रही चेहरा भी उदास न हुआ
तल्ख़ियाँ के दौर में लफ़्ज़ कभी बे-लिबास न हुआ
क़ब्र सीने में था मगर जब्र से महफ़ूज़ न रख सका
दिल में छुपाया था मगर पुख़्ता इहतिरास न हुआ
महज़ वक़्त का तक़ाज़ा था एक रिश्ता पैदा हुआ
उम्र भर साथ रहे मगर कभी रम्ज़-शनास न हुआ
उम्र को ता-उम्र तराशना हमेशा आईना दिखाना
बाद इस इल्म के भी कभी ज़माना-शनास न हुआ
कि हुस्न जब ढ़लान पर पहुँचा तो अंजुमन में कोई
इश्क़ की बात न चली मख़्बूत-उल-हवास न हुआ
कि न तो कोई ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न ही कोई दीन-दारी
कभी ख़ुद की नज़र का भी "धरम" हिरास न हुआ
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इहतिरास: सुरक्षा
रम्ज़-शनास: इशारा समझने वाला
बद-हवास: तंग
ज़माना-शनास: समय के अनुकूल काम करनेवाला
मख़्बूत-उल-हवास: जिसके होश-ओ-हवास जाते रहे हों, दीवाना
दीन-दारी: धार्मिकता
हिरास: डर, ख़ौफ़