रूदाद-ए-मोहब्बत मैं भूला नहीं हूँ अब भी याद है
वो आधा कब्र औ' आधा दलदल अब भी आबाद है
मोहब्बत की लिखी आयतें अब तो खाक-ए-सियाह है
जो भी बची है मेरी किस्मत उसमे तीरगी बे-पनाह है
मंज़िल का पता भी नहीं निकल गया हूँ राहपैमाई पर
अब तो डर लगता है यहाँ हर किसी की दिलरुबाई पर
दोज़ख़ के बराबर चल रही है यहाँ आदमखोरों की हुकूमत
अब कहीं नहीं मिलता "धरम" किसी इन्शान की सल्तनत
वो आधा कब्र औ' आधा दलदल अब भी आबाद है
मोहब्बत की लिखी आयतें अब तो खाक-ए-सियाह है
जो भी बची है मेरी किस्मत उसमे तीरगी बे-पनाह है
मंज़िल का पता भी नहीं निकल गया हूँ राहपैमाई पर
अब तो डर लगता है यहाँ हर किसी की दिलरुबाई पर
दोज़ख़ के बराबर चल रही है यहाँ आदमखोरों की हुकूमत
अब कहीं नहीं मिलता "धरम" किसी इन्शान की सल्तनत
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