मानसपटल पर पड़े वक़्त के शक्ल का मरहम
परत-दर-परत जब भी अपनी पकड़ ढीली करता है
मुझे ले जाता है अपने पुरानी यादों की दुनिया में
और संवेदना के सारे पन्ने एक-एक कर पलट देता है
शक्ल के पीछे न जाने कितने शक्लों में दीखती है दुनियाँ
मानो हज़ार रंगों के मिश्रण में रंग पहचानो प्रतियोगिता हो
दो-चार अच्छे लम्हों को तो ज़ख्म का दीमक चाट चुका है
औ' बचा-खुचा अवशेष समंदर से गहरे दिल में खो चुका है
काश! अच्छे लम्हों का स्याह गहरा होता
परत-दर-परत जब भी अपनी पकड़ ढीली करता है
मुझे ले जाता है अपने पुरानी यादों की दुनिया में
और संवेदना के सारे पन्ने एक-एक कर पलट देता है
शक्ल के पीछे न जाने कितने शक्लों में दीखती है दुनियाँ
मानो हज़ार रंगों के मिश्रण में रंग पहचानो प्रतियोगिता हो
दो-चार अच्छे लम्हों को तो ज़ख्म का दीमक चाट चुका है
औ' बचा-खुचा अवशेष समंदर से गहरे दिल में खो चुका है
काश! अच्छे लम्हों का स्याह गहरा होता