Saturday, 13 December 2014

ज़ीस्त के अंतिम प्रहर के लिए

दुखता नहीं है दिल किसी राहगर के लिए
आग लग के बुझ चुका है हमसफ़र के लिए

समंदर के मौज़ों पर बहुत अठखेलियां हुई
ज़ीस्त अब ढूंढता है किनारा बसर के लिए

दुनियाँ देख ली ज़माने को समझ भी लिया
कदम खुद-ब-खुद चल पड़ता है घर के लिए

दुनियाँ की रौशनी में अब तो आँख जलता है
जाँ बस रुकी है ज़ीस्त के अंतिम प्रहर के लिए

हर कब्रिस्तान की ज़मीं अब तो छोटी पड़ रही है
"धरम" शहर में खुल चुका है दुकाँ ज़हर के लिए

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