Thursday, 13 August 2015

रिश्ते को जलाएँ

चलो आज रिश्ते को जलाएँ
ताप लें
दिल की ठिठुरन को ख़त्म करें
साँसें गर्म निकलेंगी

जब से तुमने तौला है
मेरे जज़्बातों को
तुम हल्का महसूस कर रही हो
और मैं भारी

कितने अनकहे शब्दों के ज़ख्म
मेरे बदन पर अब भी है
टीस मारते हैं
मैं कपड़ों से ज़ख्म छुपाता हूँ

अपने चिरकाल ख़ामोशी से पहले
मैं एकबार जोर से चीखा था
गले में खून उतर आया था
छींटें तुम्हारे बदन पर भी पड़े थे

मेरे नज़्म को तुमने गाड़ दिया था
अपने घर के एक कोने में
अब देखो वहां एक पेड़ उग आया है
जिसपर जज़्बात के फल खिलते हैं
जब भी स्नेह की पत्तियां झड़ जातीं है
मैं अपने लहू से सींच देता हूँ
नई पत्तियां उग आती हैं

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