Friday, 4 September 2015

दिशाहीन रिश्ता

दिशाहीन पनपता रिश्ता
एक मजबूत आधार की तलाश में
हर रोज सिसकता है
अँधेरे में तलाशता है राह
मगर किसी अनजाने डर से
सिकुड़कर छुप जाता है
नेपथ्य से आती ध्वनि सुनकर

रिश्ते में उपजे खोखलेपन को
गर्म रेत से भरता है
इस उम्मीद में शायद
कि रिश्ते में कुछ गर्माहट आ जाए
मगर उस रेत की गर्मी से तो
रिश्ते में फफोले आने लगते हैं

रिश्ते में उपजे सन्नाटे से
जब कभी चुप्पी अट्टहास करता है
जहन में उठने लगतीं हैं सुनामी लहरें
बदन काँपने लगता है
अश्क़ और लहू के मिश्रण से
मानसपटल पर एक चेहरा
उभरने लगता है
मुस्कुराते दिल में सुराख करते
एक ओर से दूसरी ओर निकल जाता है

दिशाहीन रिश्ते को जब भी छूना चाहा
चेहरा जल उठा
पाँव फिसला
हाथ कपकपाया
और वक़्त की मार से दिल पर
ज़ख्मों का गाढ़ा निशाँ उग आया  

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