Sunday, 24 April 2016

!! उठो विप्रवर उठो !!

तप करो ऐसा कठिन कि हरा न सके कोई बुद्धि बल में
झुके चरण में नृप तेरे और हाहाकार उठे दानव दल में

अब हो संगठित ऐसे कि हर मुख गहे तेरी महिमा
अंक का यह खेल उलट दो प्राप्त करो अपनी गरिमा

लिखो खड्ग पर वेद और उपनिषद से उसे तुम तेज करो
जो भी हो विरुद्ध मानवता के तुम तुरत उसे नि:तेज करो

अर्पित अपना रक्त कर तू कर रण-चंडी का श्रृंगार
कर प्रसन्न उस देवी को तू प्राप्त कर शक्ति अपार

......अभी और लिखना बाकी है ...

Tuesday, 19 April 2016

ख़्वाब अब भी पल रहा है

तेरे गिरेबां से अब भी क्यूँ धुआं उठ रहा है
वो कौन है जिसकी याद में तू अब भी जल रहा है

मुक़द्दस चाँद था औ" वो छटकती निराली चाँदनी
क्या तेरे दिल में अब भी वो ख्याल पल रहा है

अनकहे जज़्बात जिसे हया के चादर में लपेटा था
अब उस चिलमन का एक-एक धागा निकल रहा है

खता तो उसकी थी मगर बेआबरू तुम हो गए थे
क्यूँ उसके बेशर्मी से तेरा बदन अब भी पिघल रहा है

उसे मिल गए कितने हमसफ़र अब मैं गिन नहीं सकता
उसकी उल्फ़त में "धरम" तेरा ख़्वाब अब भी पल रहा है