सच्चाई से रु-ब-रु हूँ मगर ग़फलत में रहना चाहता हूँ
ऐ! हुस्न इस बुढ़ापे में भी मैं तेरे साथ बहना चाहता हूँ
जो कल की बात भी आपने उसपर गौर नहीं फ़रमाया
उसी मसले में मैं आज कुछ और भी कहना चाहता हूँ
वो शान से उठा हुआ सर औ" कितने सल्तनत का ताज़
अपने काँधे पर सर का बोझ अब नहीं सहना चाहता हूँ
ऐसा कोई जहाँ न चाहिए की रुकूँ तो गिरने का डर रहे
ऐ! ज़मीं अब मैं ता-उम्र तुमसे लिपटकर रहना चाहता हूँ
उसका जूता इसका सर औ" फिर हर ओर क़त्ल-ऐ-आम
तेरे इस जहाँ से "धरम" अब तो मैं बस चलना चाहता हूँ
ऐ! हुस्न इस बुढ़ापे में भी मैं तेरे साथ बहना चाहता हूँ
जो कल की बात भी आपने उसपर गौर नहीं फ़रमाया
उसी मसले में मैं आज कुछ और भी कहना चाहता हूँ
वो शान से उठा हुआ सर औ" कितने सल्तनत का ताज़
अपने काँधे पर सर का बोझ अब नहीं सहना चाहता हूँ
ऐसा कोई जहाँ न चाहिए की रुकूँ तो गिरने का डर रहे
ऐ! ज़मीं अब मैं ता-उम्र तुमसे लिपटकर रहना चाहता हूँ
उसका जूता इसका सर औ" फिर हर ओर क़त्ल-ऐ-आम
तेरे इस जहाँ से "धरम" अब तो मैं बस चलना चाहता हूँ
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