Tuesday, 31 July 2018

चंद शेर

1.
बदन में यूँ ही तो आग न लगी होगी दिल में यूँ ही तो धुआँ न उठा होगा
कि क़फन में लिपटे जज़्बातोँ को 'धरम' जरूर कुछ न कुछ हुआ होगा

2.
कि किताब तो मुकम्मल हो गई मगर हाँ! उसके कई वरक़ कोरे रह गए
मानो ऐसा 'धरम' की मौत के बाद भी ज़िंदगी के कई सपने अधूरे रह गए

3.
ऐसा क्या ख़्याल करूँ की ग़म और पैदा हो ज़ख्म और गहरा हो
औरों के लिए वहॉँ बाग़ हो "धरम" मगर मेरे लिए सिर्फ सहरा हो

4.
साक़ी तू पैमाने में अब ग़म मिला न तो दरार-ए-दिल मिट न सकेगा
क्या कहूं "धरम" कि ये ऐसा दरार है जो बिना ग़म के जुट न सकेगा

Sunday, 15 July 2018

काम-ए-शबाब नहीं कहना

कि अब किसमें कौन कितना ज़िंदा है इसका जवाब नहीं कहना
भरी दुपहरी में उग आए उस महताब को आफ़ताब नहीं कहना

कि जिसको दिल समझा था वो तो हक़ीक़त में मकतल निकला
वहां कितने अरमानों का क़त्ल हुआ उसका हिसाब नहीं कहना

कि वो पूरी मौत थी औ" बाद उसके ज़ख्मों का असर कुछ न था
मरने के बाद फिर ज़िंदा तो हुआ मगर अब आदाब नहीं कहना

कि अब फिर से मरना गँवारा नहीं की अब ये नागवार गुजरेगा 
फिर से क़त्ल के उस ज़ुर्म को 'धरम' काम-ए-शबाब नहीं कहना

Thursday, 12 July 2018

चंद शेर

1.
ये कैसी हिज़्र की किताब है "धरम" यहाँ बहता अश्क़ बेहिसाब है
कि किसी से किसी की कोई बात नहीं होती सिर्फ होता आदाब है

2.
जो निकले थे आसमाँ के तलाश में तो अपने हिस्से की ज़मीं भी खो गई
नतीजा यूँ हुआ "धरम" कि मुझे महज़ हवा का एक झोंका ही डुबो गई

3.
इश्क़ कहाँ था "धरम" जो था वो आधा हुस्न था बाकी आधा आज़ार था
कि मख़मली लिबास में जो लिपटा ज़िस्म था वो अंदर से खार-खार था