Saturday, 30 March 2019

कभी ऐसे तो न चाहा तुमको

कभी ऐसे तो  न चाहा तुमको कि  तेरे जाने का  कोई मलाल होता
जब कोई अरमाँ  थी ही नहीं तो  ऐसा कुछ  न था जो  हलाल होता

हमारे ज़िस्म साथ  तो बसर करते मगर  रूह दोनों के अलग रहते
दरम्यां दोनों  अलग-अलग  रूह में  कहाँ कुछ था जो सवाल होता

यूँ तो बस  मन रखने को  हम दोनों ने  कह दिया था रिश्ता उसको 
रिश्ते को  ज़िस्म रूह  कुछ हासिल  न था तो कैसे वो पामाल होता 

साथ रहते दो  ज़िस्म जिसे  ख़ुद  अपनी-अपनी रूहों का पता नहीं
बिना जज़्बात  के ग़र वो दो ज़िस्म  मिलते भी तो क्या विसाल होता

अपनी-अपनी धुन में रहने वाले दो  ज़िस्मों के  अपने-अपने सवाल
ग़र किसी अनसुने सवाल का जवाब होता भी तो क्या कमाल होता

बिना किसी सवाल  के ग़र जवाब ढूंढती  ज़िंदगी भी तो क्या ढूंढती
उस बिना किसी सवाल वाले इम्तिहाँ का "धरम" क्या मआल होता  

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