वक़्त हर रोज क्यूँ रात की दहलीज़ पर छोड़ जाता है
सुबह होने से पहले ही वो मुझसे रिश्ता तोड़ जाता है
कि हर शाग़िर्द मुझसे मिलकर मुझे ही तन्हा करता है
वो हर रोज़ हिज़्र की दीवार में एक ईंट जोड़ जाता है
जब चला था तो मैं मेरी किस्मत औ" रहबर सब साथ थे
क्यूँ मंज़िल क़रीब आते ही रास्ता ख़ुद ही मुड़ जाता है
जब पास मेरे मसीहा औ" क़ातिल एक ही शक्ल में आए
तो मौत औ" जीवन दोनों "धरम" मुझसे बिछड़ जाता है
सुबह होने से पहले ही वो मुझसे रिश्ता तोड़ जाता है
कि हर शाग़िर्द मुझसे मिलकर मुझे ही तन्हा करता है
वो हर रोज़ हिज़्र की दीवार में एक ईंट जोड़ जाता है
जब चला था तो मैं मेरी किस्मत औ" रहबर सब साथ थे
क्यूँ मंज़िल क़रीब आते ही रास्ता ख़ुद ही मुड़ जाता है
जब पास मेरे मसीहा औ" क़ातिल एक ही शक्ल में आए
तो मौत औ" जीवन दोनों "धरम" मुझसे बिछड़ जाता है
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