Friday, 20 December 2019

चंद शेर

1.

कि बाद एक सांस के दूसरे सांस को सीने में उतरने में अब वक़्त लगता है
ये कैसा वक़्त आया "धरम" जिसे भी देखो वो आदमी बड़ा सख्त लगता है

2.

कि सिर्फ मेरा लहू ही शामिल न था  उस बुत को इन्सां बनाने में
ताल्लुकात हज़ारों लम्हों का पिरोया था 'धरम' उसमें जॉ लाने में

3.
वो शर्त ये थी कि बाद इन्तहाँ के भी न कभी ज़ख्म दिखाया जाए
न कभी आह निकले "धरम"  न कभी ग़म-ए-दास्ताँ सुनाया जाए

4.
जायका भोजन का हरेक निवाले में 'धरम' बदल जाता था
न जाने किस-किस का लहू शामिल था  उस एक थाली में

5.
कि ताज नापसंद था सर पर इसलिए हमेशा सर को झुकाए रखा
अपने इस हुनर से "धरम" उसने हमेशा ज़माने को भटकाए रखा

6.
इस हुनर से "धरम" वो हमेशा मेरे दिल में उतर कर आया
कि वो जब भी मेरे पास आया  पंख अपने कुतर कर आया

7.
कि जो भी सुबह तक जला 'धरम' चौखट उसकी रौशन रही शब भर
न जाने कितनी साँसे टूटी थी  एक गर्दन को खड़ा रखने में अदब भर 

Sunday, 15 December 2019

एक अलग ही अंदाज़-ए-बयाँ कर दिया

कि जहाँ से  जैसा भी मुझे  ख़्याल  आया मैंने सब कुछ  बयाँ कर दिया
दिल के एक हिस्से में आग लगाई औ" दूसरे हिस्से को धुआँ कर दिया

ज़िंदगी के  हरेक कदम  के लिए  कई टुकड़ों में  अपनी ज़मीं तलाशी
औ" बाद उसके  तलाशे  ज़मीं के सारे टुकड़ों  को  आसमाँ कर दिया

वो सबसे पुरानी  किताब  निकाली जिसमें कभी  एक ग़म महफूज़ था
मैंने फिर से पढ़ा औ"  एक-एक  हर्फ़ को ग़मों का आशियाँ कर दिया 

वो एक आवाज़  उठी थी  तो तख़्त  हरेक  सियासत का हिल उठा था
हुक़ूमत ने  उस हरेक शख़्स को तलाशा  औ"  फिर बेज़ुबाँ कर दिया

वो बस एक चिंगारी थी मगर जो आग दिलों में जली बहुत भयावह थी
आग ठंढी तब हुई जब उस घर में  अलग-अलग  कई मकाँ कर दिया

'धरम' वो बात जो मुझसे निकली थी वो मुझ तक फिर से पहुँच तो गई
ज़माने ने बात भी बदली औ" एक अलग ही  अंदाज़-ए-बयाँ कर दिया