बिन तेरे वो कारवाँ पहले भी सूना था अब भी सूना है
मगर क्या कहें कि दिल-ए-दर्द अब पहले से दुगुना है
जब साँसों से साँसें मिलती थी तो नज़्म उभर आता था
उस नज़्म को अपने होठों से अब क्यूँ ही गुनगुनाना है
फिर क्यूँ चेहरे पर उपजी मायूसी क्यूँ दर्द छलक आया
ऐ दिल-ए-ज़ख्म तुझे फिर से क्यूँ वही किस्सा सुनाना है
वक़्त-ए-रुख़सत कहाँ ख़त्म हुआ कुछ भी तो याद नहीं
ज़ख्म-ए-रुख़सत अब भी है जिसे रह-रहकर भुलाना है
ये कैसी बज़्म है जिसमे एक मेरा अक्स है और एक मैं
ऐसे बज़्म में अपने ही दिल से दिल को क्या मिलाना है
मौसम इश्क़ का बदलने से पहले ही ईंसाँ बदल जाता है
बाद इसके भी "धरम" कैसे हर कोई तुम्हारा दीवाना है
मगर क्या कहें कि दिल-ए-दर्द अब पहले से दुगुना है
जब साँसों से साँसें मिलती थी तो नज़्म उभर आता था
उस नज़्म को अपने होठों से अब क्यूँ ही गुनगुनाना है
फिर क्यूँ चेहरे पर उपजी मायूसी क्यूँ दर्द छलक आया
ऐ दिल-ए-ज़ख्म तुझे फिर से क्यूँ वही किस्सा सुनाना है
वक़्त-ए-रुख़सत कहाँ ख़त्म हुआ कुछ भी तो याद नहीं
ज़ख्म-ए-रुख़सत अब भी है जिसे रह-रहकर भुलाना है
ये कैसी बज़्म है जिसमे एक मेरा अक्स है और एक मैं
ऐसे बज़्म में अपने ही दिल से दिल को क्या मिलाना है
मौसम इश्क़ का बदलने से पहले ही ईंसाँ बदल जाता है
बाद इसके भी "धरम" कैसे हर कोई तुम्हारा दीवाना है
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