रास्ते कल के क्या होंगे जब मंज़िल को ही ज़मीं निंगल गई हो
चीख को समंदर खा गया हो रौशनी आसमाँ कहीं में खो गई हो
चीख को समंदर खा गया हो रौशनी आसमाँ कहीं में खो गई हो
एक मुद्दत से चेहरे पर मायूसी का राज है जो अब भी आबाद है
कोई भी ख़ुशी वापस कैसे आए जब सब के सब कहीं खो गई हो
कोई भी ख़ुशी वापस कैसे आए जब सब के सब कहीं खो गई हो
महज साँस लेने को ही एक पूरी मुकम्मल ज़िंदगी कहना पड़ता है
जब हरेक ख्वाईश चादर ओढ़े अपने कब्र-ए-मुक़र्रर में सो गई हो
जब हरेक ख्वाईश चादर ओढ़े अपने कब्र-ए-मुक़र्रर में सो गई हो
अँधेरा ऐसा है की सूरज के निकलने से कोई फ़र्क पड़ता ही नहीं
गोया शाम रात के आगोश में ऐसे सोई की जैसे कहीं खो गई हो
गोया शाम रात के आगोश में ऐसे सोई की जैसे कहीं खो गई हो
हर लम्हा ऐसा बीतता है मानो साँस टूटने से पहले दम टूट जाता है
ख़ुद अपनी ही नज़रों में अपनी ही नज़र "धरम" कहीं खो गई हो
ख़ुद अपनी ही नज़रों में अपनी ही नज़र "धरम" कहीं खो गई हो
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