Sunday, 20 December 2020

मंज़िल को ही ज़मीं निंगल गई हो

रास्ते कल के  क्या होंगे  जब मंज़िल को ही ज़मीं  निंगल गई हो 
चीख को समंदर खा गया हो रौशनी आसमाँ कहीं में खो गई हो

एक मुद्दत से चेहरे पर मायूसी का राज है जो अब भी आबाद है 
कोई भी ख़ुशी वापस कैसे आए जब सब के सब कहीं खो गई हो 

महज साँस लेने को ही एक पूरी मुकम्मल ज़िंदगी कहना पड़ता है 
जब हरेक ख्वाईश चादर ओढ़े अपने कब्र-ए-मुक़र्रर में सो गई हो  

अँधेरा ऐसा है की सूरज के निकलने से कोई फ़र्क पड़ता ही नहीं 
गोया शाम रात के आगोश में ऐसे सोई की जैसे कहीं खो गई हो

हर लम्हा ऐसा बीतता है मानो साँस टूटने से पहले दम टूट जाता है  
ख़ुद अपनी ही नज़रों में अपनी ही नज़र "धरम" कहीं  खो  गई  हो

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