Saturday, 26 February 2022

चंद शेर

1.
ख़याल को जब भी शक्ल मिला एक झुलसा हुआ चेहरा मिला 
बदन को कोई ख़ुशबू न मिली 'धरम' रंग लहू को उतरा मिला

2.
वो पहले वा'दा-ख़िलाफ़ी करता है औ" फिर झुक जाता है 
'धरम' तन्हाई से शुरू होता है औ" इश्क़ पर रुक जाता है 

3.
सीने में उतरता तो है मगर सूराख़ नहीं करता 
कैसा इश्क़ है 'धरम' कभी बेबाक नहीं करता

4.
क्या कहें कि  एक चेहरा औ" एक ही फ़साना है 
मोहब्बत में "धरम" अब एक ऐसा भी ज़माना है 

5.
इश्क़ में "धरम" बदलता रहा  मिज़ाज उम्र भर
अश्क़-औ-लहू में होता रहा इम्तिज़ाज उम्र भर

(# इम्तिज़ाज = मिलावट) 

6.
ज़काब मेरा ख़ून-ए-दिल था "धरम" कलम उसका खंज़र था 
वो एक फ़ैसला-ए-क़िताब लिखा जिसका हर वरक़ बंजर था 

7.
ख़्वाब में मिलते भी हैं  तो लब पर ख़ामोशी रखते हैं  
औ" चेहरे पर "धरम" ख़याल-ए-फ़रामोशी रखते हैं 

8.
सितम की पैदाइश थी वो सितम का ही ज़माना था 
हर ज़ुबाँ पर 'धरम' बस फ़ाहिश का ही फ़साना था
 
(# फ़ाहिश : हद से गुज़रने वाला
# फ़साना : कहानी)

9.
हर रास्ता 'धरम' एक दलदल पर ख़त्म होता है 
औ" मंज़िल पर न जाने  क्या-क्या कत्म होता है

(#कत्म : छिपाव, पोशीदगी)


Friday, 18 February 2022

कोई भी तबीब न हुआ

अक़ीदत का एक भी फूल मेरे दामन को नसीब न हुआ  
कारवाँ में शामिल तो था  मगर कोई भी   क़रीब न हुआ  

न तो देखा हुआ तबस्सुम  न ही  तसव्वुर में उभरा चेहरा
एक अजनबी मुझसे मिला  औ" कुछ भी अजीब न हुआ  

वो शख़्स दरिया-ए-उल्फ़त की शक्ल का था औ" ख़ुश था 
उम्मीद के तराजू पर तौला गया औ" वो भी हबीब न हुआ

जहाँ भी नज़र डाली  बाद उस दोनों के  वहां कोई न रहा 
वह ऐसा शख़्स था जिसका कभी भी कोई रक़ीब न हुआ 

क्यूँ हर रोज तन्हाई की  उम्र मुसलसल  दराज़ होती गई 
'धरम' क्यूँ ज़माने में इस मर्ज़ का कोई भी तबीब न हुआ