अक़ीदत का एक भी फूल मेरे दामन को नसीब न हुआ
कारवाँ में शामिल तो था मगर कोई भी क़रीब न हुआ
कारवाँ में शामिल तो था मगर कोई भी क़रीब न हुआ
न तो देखा हुआ तबस्सुम न ही तसव्वुर में उभरा चेहरा
एक अजनबी मुझसे मिला औ" कुछ भी अजीब न हुआ
एक अजनबी मुझसे मिला औ" कुछ भी अजीब न हुआ
वो शख़्स दरिया-ए-उल्फ़त की शक्ल का था औ" ख़ुश था
उम्मीद के तराजू पर तौला गया औ" वो भी हबीब न हुआ
उम्मीद के तराजू पर तौला गया औ" वो भी हबीब न हुआ
जहाँ भी नज़र डाली बाद उस दोनों के वहां कोई न रहा
वह ऐसा शख़्स था जिसका कभी भी कोई रक़ीब न हुआ
वह ऐसा शख़्स था जिसका कभी भी कोई रक़ीब न हुआ
क्यूँ हर रोज तन्हाई की उम्र मुसलसल दराज़ होती गई
'धरम' क्यूँ ज़माने में इस मर्ज़ का कोई भी तबीब न हुआ
'धरम' क्यूँ ज़माने में इस मर्ज़ का कोई भी तबीब न हुआ
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