कुछ दवा नींद की थी कुछ दुआ ख़्वाब के थे
फिर जो खुली आँख तो सारे रंग शहाब के थे
बाज़ार में ख़ुद को नीलाम करते भी तो कैसे
हर कोई जानता था शौक़ उसके नवाब के थे
वो जो दिल का नग़्मा था साँसों की ख़ुशबू थी
सीने में पैवस्त सारे ख़ंजर उसी सिहाब के थे
कुछ ख़ता ता'लीमी कुछ हम-ज़ुबानी की थी
फिर ये क्यूँ ही कहना जुर्म सारे शबाब के थे
हाथों की लकीरें अब पेशानी पर उभर आए
साथ तिरे गुज़रे वक़्त जज़्बा-ए-बे-ताब के थे
हथेली पर चाँद रखना आँखें मिलाना चूमना
उल्फ़त के सारे फ़ैसले "धरम" शिताब के थे
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शहाब : गहरा लाल (सुर्ख़) रंग
सिहाब : साथी, मित्र
शबाब : उठती जवानी, तरूणाई, युवाकाल
जज़्बा-ए-बे-ताब : अधीर भावना
शिताब : शीघ्रता किया हुआ
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