Monday, 12 June 2023

सारे रंग शहाब के थे

कुछ दवा नींद की थी कुछ दुआ ख़्वाब के थे 
फिर जो खुली आँख तो सारे रंग शहाब के थे

बाज़ार में  ख़ुद को नीलाम करते भी तो कैसे 
हर कोई जानता था शौक़ उसके नवाब के थे

वो जो दिल का नग़्मा था साँसों की ख़ुशबू थी    
सीने में पैवस्त सारे ख़ंजर उसी सिहाब के थे
 
कुछ ख़ता ता'लीमी कुछ हम-ज़ुबानी की थी  
फिर ये क्यूँ ही कहना जुर्म सारे शबाब के थे

हाथों की लकीरें अब पेशानी पर उभर आए
साथ तिरे गुज़रे वक़्त  जज़्बा-ए-बे-ताब के थे
 
हथेली पर चाँद रखना आँखें मिलाना  चूमना 
उल्फ़त के सारे फ़ैसले "धरम" शिताब के थे   
    
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शहाब : गहरा लाल (सुर्ख़) रंग
सिहाब : साथी, मित्र
शबाब : उठती जवानी, तरूणाई, युवाकाल
जज़्बा-ए-बे-ताब : अधीर भावना
शिताब : शीघ्रता किया हुआ
 

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