Wednesday, 22 November 2023

हर रंग छुड़ाता रहा

कभी तन्हाई जलाती रही कभी शोर सताता रहा 
कि मंज़र कोई भी हो  दिल हमेशा  दुखाता रहा
   
वो धुआँ कहाँ से उठा  क्यूँ उठा  कुछ पता नहीं
मगर हाँ धुआँ में तैरता  कोई चेहरा छुपाता रहा 

वो बर्क़ न थी हिज़्र के  आबरू एक कहानी थी
राख ज़मीं से उड़ा औ" आसमाँ में समाता रहा

नींद का न आना हरेक ख़्वाब का क़त्ल ही था
फिर मुर्दा आँखें बंद कर ख़ुद को सुलाता रहा

नसीब में था  एक हथेली आसमाँ  चंद सितारे   
फिर वो त'अल्लुक़ उम्र-भर क़र्ज़ चुकाता रहा

हाथों पर चेहरे का हर रंग उभरता रहा "धरम" 
फिर बड़े इल्म-ओ-फ़न से हर रंग छुड़ाता रहा 

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