वो वक़्त अब कहीं नहीं जिसमें ख़याल जवाँ होता है
दिल ज़ख़्म-ज़ख़्म तो है मगर अब दर्द कहाँ होता है
कमरे में यूँ ही बैठे रहे ख़ामोशी से कुछ गुफ़्तगू की
कोई सवाल जवाब नहीं मगर एक इम्तिहाँ होता है
एक ही क़ातिल एक ही ख़ंजर एक ही तौर-ए-क़त्ल
फिर भी हरेक क़त्ल का कोई अलग निशाँ होता है
ये कैसी महफ़िल है यहाँ हर क़िरदार बर्फ़-नशीं है
कोई लफ्ज़ निकले तो मंज़र शो'ला-फ़िशाँ होता है
सफ़र में निकले तो मील के पत्थर से रहनुमाई ली
ये ख़बर न थी की रहबर ख़ुद यहाँ गुमरहाँ होता है
उससे गुफ़्तगू की हक़ीक़त "धरम" क्या बयाँ करूँ
आग़ाज़ जैसा भी हो अंजाम शोर-ए-फ़ुग़ाँ होता है
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शो'ला-फ़िशाँ : आग उगलने वाला
गुमरहाँ : जो अपना रास्ता खो दिया, विकृत व्यक्ति
शोर-ए-फ़ुग़ाँ : विलाप, मातम
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