पता नहीं जज़्बात सारे मर कर किधर जाते हैं
किताबों में कभी-कभी कुछ हर्फ़ उभर जाते हैं
दरमियाँ गुफ़्तगू के आँखें दोनों की बंद ही रही
फिर नज़र मिलाते हैं औ" दोनों बिखर जाते हैं
तन्हाई भी आकर चली गई अश्क़ भी सूख गए
ये किसके इन्तिज़ार में तिरे आठों-पहर जाते हैं
सारे ज़ख़्मों के निशाँ जो चेहरे पर थे मिट चुके
तू ऐसी दवा बता जिससे दाग़-ए-जिगर जाते हैं
नज़र औ" दिल दोनों के जहाँ अलग-अलग हैं
मस'अले दिल के सारे मावरा-ए-नज़र जाते हैं
इंसां की मंज़िल दोज़ख़ या जन्नत ही है 'धरम'
कौन लोग हैं जो मरकर महबूब-नगर जाते हैं
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दाग़-ए-जिगर : प्रेम की आग का दाग़
मावरा-ए-नज़र : दृष्टि से परे
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