Friday, 30 May 2025

परिंदा कोई बेनाम यारो

आसमाँ को गिरने दो इसे और न अब थाम यारो
हो जाने दो अपने भरम का तश्त-अज़-बाम यारो

इमां तो बिक चुका है मगर डर अब भी ज़िंदा है 
यहाँ अब काम कोई होता नहीं खुले-'आम यारो

कोई तो सितम हुआ की गर्दन उसकी झुक गई  
यहाँ कौन करता है  सर-ए-आम एहतिराम यारो

ख़ुशी या ग़म जो भी हो एक चराग़ रौशन करना 
कभी ज़िंदगी में ग़र हो कोई सुब्ह या शाम यारो

जिस्म ज़िंदा है मगर रूह तो सबका मर चुका है
कुछ तो बताओ यहाँ कैसे करते हो क़याम यारो  
        
अभी तो क़ाफ़िला चला ही है मंज़िल अभी दूर है
अभी से इतना मत किया करो दुआ-सलाम यारो

अभी तो सिर्फ़ ज़ुबाँ कटी है और सब सलामत है    
ठहरो की अभी कुछ और भी मिलेगा इनाम यारो

ख़याल नहीं "धरम" मगर उसका कुछ नाम तो है   
ख़ुद को तो वो कहता है परिंदा कोई बेनाम यारो       


---------------------------------------------
तश्त-अज़-बाम : भेद खुलना
एहतिराम : सम्मान

Tuesday, 27 May 2025

राष्ट्र प्रथम पर एक कविता

धर्म पूछ कर मारा जिसने 
माँ भारती को ललकारा जिसने 

वे मानवता पर हैं कलंक हैं नर-पिचाश के वंश 
अपने इस कुकृत्य का झेलना होगा इन्हें दंश 

ये सनातनी परंपरा है सिन्दूर है अनमोल 
इसे किसी भी तुला पर न पाओगे तोल 

छेड़ा है तुमने तो मोल चुकाना होगा 
आसमाँ से बरसेगी आग तुम्हें बस पछताना होगा 

जहाँ हो नारी शक्ति, वीर सपूत और धर्म भी हो साथ 
उस पवन धरती का अपमान करोगे तो काट जायेगा हाथ 

यहाँ तुमने मासूमों का अकारण रक्त बहाया है 
ऐ आतंकियों तुमने तो मानवता को भी भरमाया है 

कायरों की भाँति तुमने वार किया है आम जनों पर 
अब तो बरसानी होगी आग तुझ जैसे सर्पों के फनों पर 

तुझ जैसे पापियों को न्याय क्या है बतलाना होगा 
अदम्य साहस शौर्य पराक्रम का परिचय देना होगा 

लो ये बरसी आग तुझपर इससे अब न बच पाओगे 
अगर बच भी गए तो जीवन में और क्या पाओगे 

यह भारतवर्ष है सर्पों से भी युद्ध में धर्म नहीं छोड़ेगा 
"जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे" से युक्तियुक्त संधान करेगा 

नमन है यहाँ की सेना को उन सशस्त्र बल को 
जिन्होंने कुचला है आतंकियों को और उसके शीश महल को 

विश्व को धर्म का मार्ग बतलाते हैं यहाँ के सपूत 
सब मिलकर इन्हें नमन करें ये हैं मानवता के दूत 

इनके साहस शौर्य पराक्रम की गाथा का बार-बार करें गुणगान 
और शहीदों को दें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि और सम्मान 

!! भारत माता की जय !! 
!! जय हिन्द की सेना !!

Thursday, 15 May 2025

ज़मीं से निकाल कर लिया

ज़िंदगी पर जो फ़ैसला लिया सिक्का उछाल कर लिया
दोस्ती हो या दुश्मनी जो मिला  ख़ुश-ख़याल कर लिया

रंग-ए-मिज़ाज़ रंग-ए-फ़िज़ा ही रहा  और आरज़ू न रही
रंग-ए-स्याह को भी क़ुबूल अबीर-ओ-गुलाल कर लिया

यहाँ इंसाफ़ के तराजू का एक पलड़ा हमेशा भारी रहा   
बग़ैर जुर्म के भी ग़र कोई सज़ा मिली हलाल कर लिया

वो महज़ जुर्म न था बर्बरता की एक जागती मिशाल थी    
माज़ी का हिसाब मौजूदा ने ज़मीं से निकाल कर लिया

वह ईमान का सौदा था वहाँ ज़मीं भी थोड़ी धँस गई थी
इंसानियत जो मंज़र कभी न देखा था बहाल कर लिया
     
आरज़ूओं की महफ़िल थी वहाँ मोहरों की नुमाइश थी 
इम्तिहाँ ऐसा कि "धरम" बर्फ़ को भी उबाल कर लिया