ज़िंदगी पर जो फ़ैसला लिया सिक्का उछाल कर लिया
दोस्ती हो या दुश्मनी जो मिला ख़ुश-ख़याल कर लिया
रंग-ए-मिज़ाज़ रंग-ए-फ़िज़ा ही रहा और आरज़ू न रही
रंग-ए-स्याह को भी क़ुबूल अबीर-ओ-गुलाल कर लिया
यहाँ इंसाफ़ के तराजू का एक पलड़ा हमेशा भारी रहा
बग़ैर जुर्म के भी ग़र कोई सज़ा मिली हलाल कर लिया
वो महज़ जुर्म न था बर्बरता की एक जागती मिशाल थी
माज़ी का हिसाब मौजूदा ने ज़मीं से निकाल कर लिया
वह ईमान का सौदा था वहाँ ज़मीं भी थोड़ी धँस गई थी
इंसानियत जो मंज़र कभी न देखा था बहाल कर लिया
आरज़ूओं की महफ़िल थी वहाँ मोहरों की नुमाइश थी
इम्तिहाँ ऐसा कि "धरम" बर्फ़ को भी उबाल कर लिया
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