Saturday, 19 July 2025

दोनों अरमाँ निगलते हैं

जो लोग मरकर सितारे बनते हैं आसमाँ में मिलते हैं 
वो लोग उस जहाँ में भी एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

सुबह कोई और सूरज था  शाम कोई और सूरज है 
कि ज़मीं हो या हो आसमाँ  दोनों अरमाँ निगलते हैं 

वक़्त ने जो भी मरज दिया मुसलसल बढ़ता ही गया  
कैसे कह दें कि वक़्त के मारे लोग कभी सँभलते हैं

जिन जुगनुओं की उम्मीद पर मैंने चिराग़ बुझा दिया
पता न था वो सारे मेरे दुश्मन के इशारों पर जलते हैं

वो जो सच्चाई है सब को पता है ज़मीं में दफ़्न भी है
लोग किस क़ब्र में गड़ते हैं किस क़ब्र से निकलते हैं 
    
इस बारिश के मौसम में "धरम" दो रंगों के बादल हैं  
दोनों साथ घिरते हैं  दोनों पानी औ" आग उगलते हैं 

Saturday, 12 July 2025

मिट्टी में समा गया

कैसे आँखों के आगे बादल सा कुछ छा गया
रूह जिस्म से निकलकर मिट्टी में समा गया
 
आवाज़ अनजानी थी चेहरा भी अनजाना था
न जाने क्यूँ आया औ" गीत ख़ुशी के गा गया

ख़ामोशी से आया शायद ख़ुदा का करम था     
आकर उजड़े गुलसन को फिर से बसा गया

ख़ामोशी ने शोर से न जाने क्या उधार लिया
सुकूँ के समंदर से भी अब सन्नाटा चला गया

ख़ुर्शीद का एहतराम करना चाँद को चूमना 
जाने क्यूँ इस बात पर दिल फिर पथरा गया
        
फूलों के क़त्ल का "धरम" कोई ग़वाह न था
बड़ी आसानी से बाग़बाँ बाग़ को भरमा गया