जो लोग मरकर सितारे बनते हैं आसमाँ में मिलते हैं
वो लोग उस जहाँ में भी एक दूसरे के होंठ सिलते हैं
वो लोग उस जहाँ में भी एक दूसरे के होंठ सिलते हैं
सुबह कोई और सूरज था शाम कोई और सूरज है
कि ज़मीं हो या हो आसमाँ दोनों अरमाँ निगलते हैं
वक़्त ने जो भी मरज दिया मुसलसल बढ़ता ही गया
कैसे कह दें कि वक़्त के मारे लोग कभी सँभलते हैं
जिन जुगनुओं की उम्मीद पर मैंने चिराग़ बुझा दिया
पता न था वो सारे मेरे दुश्मन के इशारों पर जलते हैं
वो जो सच्चाई है सब को पता है ज़मीं में दफ़्न भी है
लोग किस क़ब्र में गड़ते हैं किस क़ब्र से निकलते हैं
इस बारिश के मौसम में "धरम" दो रंगों के बादल हैं
दोनों साथ घिरते हैं दोनों पानी औ" आग उगलते हैं