Saturday, 12 July 2025

मिट्टी में समा गया

कैसे आँखों के आगे बादल सा कुछ छा गया
रूह जिस्म से निकलकर मिट्टी में समा गया
 
आवाज़ अनजानी थी चेहरा भी अनजाना था
न जाने क्यूँ आया औ" गीत ख़ुशी के गा गया

ख़ामोशी से आया शायद ख़ुदा का करम था     
आकर उजड़े गुलसन को फिर से बसा गया

ख़ामोशी ने शोर से न जाने क्या उधार लिया
सुकूँ के समंदर से भी अब सन्नाटा चला गया

ख़ुर्शीद का एहतराम करना चाँद को चूमना 
जाने क्यूँ इस बात पर दिल फिर पथरा गया
        
फूलों के क़त्ल का "धरम" कोई ग़वाह न था
बड़ी आसानी से बाग़बाँ बाग़ को भरमा गया

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.