Tuesday, 17 March 2026

गवाही क़ुबूल नहीं होती

कि तिरे दर पे बात कोई भी फ़ुज़ूल नहीं होती  
वहाँ चाँद सितारों की गवाही क़ुबूल नहीं होती

किसी की बर्बादी पर यूँ चुप रहना मुँह मोड़ना
आँखों में पड़ी धूल महज़ कोई भूल नहीं होती

चराग़ों को न जाने क्यूँ तारीक़ी रास आने लगी
ये यारी कभी भी क़ाबिल-ए-क़ुबूल नहीं होती

यहाँ सबकी तबी'अत को  ये कैसी नज़र लगी  
अब तो यहाँ साँसें भी हवा में हुलूल नहीं होती

कभी ज़मीं निगल गई  कभी आसमाँ खा गया 
ख़ुद की तलाश में अब साँसें निर्मूल नहीं होती

एक झोंका था जो तूफ़ान में बदल गया 'धरम'
उसकी तलाश में अब आँखें मलूल नहीं होती

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हुलूल: एक चीज़ का दूसरी चीज़ में पूरी तरह घुल जाना
मलूल: उदास, खिन्न, दुखी, दुःखित, रंजीदा

Sunday, 1 February 2026

आसमाँ तो अब भी खुला है

आसमाँ को क्या होगा आसमाँ तो अब भी खुला है  
ज़मीं पर लगी किसी आग में कब आसमाँ जला है

हर कोई शक़्ल अपनी आईने में देखो औ" बताओ 
कि ख़ून को पानी में मिलाने को यहाँ कौन तुला है

वो एक शर्त न जाने कितनी शर्तों को साथ लाई थी
न जाने अलावा मेरे और कितनों का होंठ सिला है

ज़िद मत करो वक़्त को अपने हिसाब से ढलने दो  
चलो लौट चलें  कब ख़ुर्शीद वक़्त से पहले ढला है

एक तो तीरगी उसमें  आलम-ए-तन्हाई भी मौज़ूद 
ख़ुद से पूछो कि इसमें हुआ कब किसका भला है
   
न तो वहाँ ज़मीं ही थी "धरम" न तो आसमाँ ही था   
महज़ एक भरम था ज़मीं वहाँ आसमाँ से मिला है

Saturday, 10 January 2026

हालात भी बदलने लगे

जब ईमान बदला तो हालात भी बदलने लगे  
ख़ुद से पूछने वाले सवालात भी बदलने लगे
 
बस एक सवाल था अब्र बराबर क्यूँ न बरसे  
इस पर जुर्म भी किया  बात भी बदलने लगे

फ़िज़ा-ए-उल्फ़त में  तारीक़ी बात घोली गई   
फिर उस बात पर  जज़्बात भी बदलने लगे

कि बात अब हवा पानी रौशनी तक आ गई
बुनियादी सारे  मु'आमलात भी बदलने लगे

पहले तो सर-ए-आम इक़रार-ए-जुर्म कराये
फिर लगाने वाले  दफ़'आत भी बदलने लगे

वहाँ क़िमार-बाज़ की बड़ी लम्बी क़तार थी
बाज़ी आते-आते ता'ज़ीरात भी बदलने लगे

उस शख़्स की "धरम" अब हैसियत देखिए  
उसके इशारे पर दिन-रात भी बदलने लगे