आसमाँ को क्या होगा आसमाँ तो अब भी खुला है
ज़मीं पर लगी किसी आग में कब आसमाँ जला है
हर कोई शक़्ल अपनी आईने में देखो औ" बताओ
कि ख़ून को पानी में मिलाने को यहाँ कौन तुला है
वो एक शर्त न जाने कितनी शर्तों को साथ लाई थी
न जाने अलावा मेरे और कितनों का होंठ सिला है
ज़िद मत करो वक़्त को अपने हिसाब से ढलने दो
चलो लौट चलें कब ख़ुर्शीद वक़्त से पहले ढला है
एक तो तीरगी उसमें आलम-ए-तन्हाई भी मौज़ूद
ख़ुद से पूछो कि इसमें हुआ कब किसका भला है
न तो वहाँ ज़मीं ही थी "धरम" न तो आसमाँ ही था
महज़ एक भरम था ज़मीं वहाँ आसमाँ से मिला है
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