Thursday, 15 December 2011

वह अब भी जवां था...

अपनी ही सूरत देखकर हैरां हो गया
आइना देखा और फिर परेशां हो गया
चेहरे पर पड़ी झुर्रियां भी ढीली हो गई
लब्ज़ भी कुछ लडखडा सा गया
एक आह! सी निकली जुबां से
हाय! क्या उसका चेहरा हो गया


वह चेहरा जिसे कभी
ओस की बूंद पिलाता था
चन्दन का लेप लगता था
कभी गुलाब जल में रुई भिंगो कर रगड़ता था
तो कभी मर्द पार्लर में संजोता था
और न जाने क्या क्या करता था

फिर एहसास हुआ उसे अपने बुढ़ापे का
मगर जब उसने अपने दिल से पूछा
तो उत्तर कुछ और ही पाया
फिर वह शरमाया, घबराया, बलखाया
और फिर बीते लम्हों को
पुनः जिंदा करने के लिए चल पड़ा
उन्हीं गलिओं में, उन्हीं सड़कों पर ........ 

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