Tuesday, 3 April 2012

लघु कथा ...

वह आदतन कुछ तेज़ चल रहा था
रास्ते  बड़े  कठिन  थे
उसके चंद साथी  भी रास्ते में छूट गए
उसका मंजिल था " खुद का भाग्य पढना " 
रास्ते में उसने एक फकीर को देखा
सलाम फ़रमाया  और  फिर हाथ बढाया  
फकीर उसके हाथ की लकीरों को पढ़  रहा था
और कुछ बुदबुदा भी रहा था
वह कुछ समझ नहीं  पा रहा था
मगर उसे मंजिल का पता मिल गया 
वह उस पते की ओर बढ़  रहा था
और फिर वहां पहुँच जाता  है
जहाँ उसका भाग्य लिखा था
दरवाजे पर पहुँचकर वह आवाज़ देता है
चंद लम्हों के फासले पर
एक  फ़रिश्ता हाज़िर होता है
बिलकुल उसी के कद-काठी और शक्ल का
वह फ़रिश्ता कुछ यूँ फरमाता है
" जब तुम अपना भाग्य पढने के लिए
इतना कठिन परिश्रम कर सकते हो
तो अपना भाग्य भी तुम खुद लिख सकते हो "
यह सुनकर वह वापस आ जाता है
और फिर जुड़ जाता है अपने कार्यों में !!

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