अजीब कशमकश में
मैं यूँ पड़ा हुआ हूँ
कुछ समझ न पा रहा हूँ
तू करीब है की दूर है
मैं आँखें बंद करता हूँ
तुमको करीब पाता हूँ
पलक जब खोलता हूँ फिर
तुमको दूर पाता हूँ
जिसे मैं दूर कहता हूँ
उसे कोई करीब कहता है
जिसे मैं करीब कहता हूँ
उसे कोई दूर कहता है
बदलते रिश्तों की दुनिया में
अब वह चाँद भी चुप है
" चंदा मामा " को कोई अब
" साला चाँद " कह रहा है
न जाने अब यहाँ क्यूँ
रिश्तों की घटी दुरी सी लगती है
मगर वह " साला चाँद " कहने वाला
मुझे कुछ दूर लगता है
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