Tuesday, 27 November 2012

झूठी तस्सली


जिंदगी
तुम मुझसे दूर क्यूँ हो
कभी तो हल्की सी मुस्कराहट
और फिर कभी वही बेरुखी
फासला भी सिर्फ चार कदम का

मैंने देखा है तुमको मुखौटे बदलते
ढेर सारे चेहरे हैं तुम्हारे
बदला चेहरा और बदला अंदाज़
मैं अक्सर धोखा खा जाता हूँ
ये तुम हो की कोई और है

मगर फिर तुम्हारा
वही चेहरा नज़र आता है
जिसमे तुम अक्सर नज़र आती हो
कभी-कभी मुस्कुराती हुई
तस्सली होती है
कि यही तुम्हारा असली चेहरा है
मगर मुझे पता है
मेरी तस्सली झूठी है

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