उम्र भर का साथ
रक्खा तो सही उसने निभाया ही नहीं
मिलकर साथ चले थे
मैं गिर पड़ा उसने उठाया ही नहीं
मैं खुद उठा चल पड़ा पास पहुंचा
मेरी आहट को उसने पहचाना ही नहीं
मेरा भरम अभी जिन्दा था
सामने ही मेरे वो परिंदा था
हाथ पकड़ा नाम पूछा
झटका हाथ मेरा और जुबां खामोश
मैं उसके साथ था खामोश था उदास था
अचानक एक और लम्हा आया
हलक में जाँ मेरी अटक गई थी
वो गैरों की बाँहों में लिपट गई थी
मेरे जज्बात पर हुस्न उसका भारी था
मैं तो बस चंद कदमों का सवारी था
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