मेरे घर से मुर्दाघर की करीबी बहुत है
मैं जहाँ रहता हूँ वहाँ गरीबी बहुत है
हम हँस के जिए खूब जिए फ़ाकामस्ती किए
फिर भी जिंदगी में मजाज़ी बहुत है
कभी खुद से मिले कभी मुर्दे से मिले
हम तो हर गर्दिश-ए-दौराँ से मिले
महफ़िल में गए तो सदर-ए-मजलिस रहे
और जो तन्हाई में रहे तो घुट-घुट के रहे
गैरों के ज़ख्म भी देखे मरहम भी किये
हम जहाँ भी रहे "धरम" मुज़ाहकः से रहे
मैं जहाँ रहता हूँ वहाँ गरीबी बहुत है
हम हँस के जिए खूब जिए फ़ाकामस्ती किए
फिर भी जिंदगी में मजाज़ी बहुत है
कभी खुद से मिले कभी मुर्दे से मिले
हम तो हर गर्दिश-ए-दौराँ से मिले
महफ़िल में गए तो सदर-ए-मजलिस रहे
और जो तन्हाई में रहे तो घुट-घुट के रहे
गैरों के ज़ख्म भी देखे मरहम भी किये
हम जहाँ भी रहे "धरम" मुज़ाहकः से रहे
bahut khoob
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