Saturday, 7 December 2013

ज़िंदगी

ज़िंदगी की डोर भी बड़ी अजीब होती है
जितनी सुलझाओ उतनी उलझती चली जाती है

जब भी कभी ज़ख्म पर मरहम लगाता हूँ
तो और भी गहरा ज़ख्म उभर कर आता है

जब भी दिल में अपने लहू का चिराग जलाता हूँ
न जाने क्यूँ आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है

चांदनी रात भी अब अमावस सा क़हर बरपा जाती है
ज़ख्म-ए-दिल अब तो हर मौसम में तेरी याद भुला जाती है

अब न तो दर्द की दवा करता हूँ और न ही दर्द-ए-बेदवा पाता हूँ
ज़िंदगी कैसी हो गई हो तुम हर कदम पर तुमको बेवफा पाता हूँ

हर चेहरा एक पहाड़ सा दीखता है और आँख समंदर सा दीखता है
दिल में एक तूफाँ सा दीखता है और ज़िस्म खंड़हर सा दीखता है

मैं तो "धरम" अब रिश्तों में यूँ ही उलझना छोड़ दिया हूँ
ज़िंदगी को थाम कर तो रखा हूँ मगर जीना छोड़ दिया हूँ


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