Thursday, 28 November 2013

अठखेलियां करती ज़िंदगी

तुम्हारी वो मौजों भरी ज़िंदगी
मानो बीच समंदर में
जैसे लहरें अठखेलियां करती
उछलती कूदती समंदर में खो जाती

फिर दूर कहीं और किसी दूसरे तूफां के साथ 
ठिठोली करती हज़ारों रंग में जीवन के सपने बुनती 
ऐसा मानो कि इंद्रधनुष का रंग भी फींका हो 
और मौजों के ढलने पर तुम अकेले निकल जाती 

तुम्हें समंदर के गहराई का अंदाजा हो गया है 
अब तुम ज़िंदगी में किनारा ढूंढने लगे हो 
तुम तो हमेशा सफ़र में अकेले चला करते थे 
मगर अब तुम सहारा ढूंढने लगे हो 

ज़िंदगी के हर रिश्ते को जलाकर तापा है मैंने  
बुझती लौ को अपने साँसों से हवा दी है
मेरी साँसें बुझती यादों के साथ ठंढी हो गई है  
अब वो रिश्ता एक दफनाया जनाज़ा सा है 

बगैर तेरे हर रात 
तन्हाई में मैं रिश्ते को जलाता था 
रिश्ता जलता था और फिर कमरा 
तुम्हारी यादों से रौशन हो जाता था  
मगर वो यादें कब की बुझ चुकी हैं  

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