Monday, 9 November 2015

कोई बात न होती है

अब न तो ख्वाब में मुलाकात ही होती है
औ" पड़ जाए सामने तो बात न होती है

ख्यालों की दुनिया से निकल गया हूँ मैं
ज़िंदगी में अब कभी चांदनी रात न होती है

मैं जब से लुटा हूँ बस तन्हा ही जी रहा हूँ
मुफ़लिस के साथ कभी बारात न होती है

ऐ! मौला ज़िंदगी के बोझ से दब गया हूँ मैं
आह! भरूँ तो उसमे भी जज़्बात न होती है

मैं जहाँ रहता हूँ वहां तो हर कोई मतलबी है
"धरम" मेरी किसी से कोई बात न होती है

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