Saturday, 3 October 2015

ज़माने से नेकी कर

तुम्हें ग़र खुद पर यकीं है तो औरों पर भी यकीं कर
तू दिल से निकाल दे रंजिश औ" ज़माने से नेकी कर

इंसान ग़र खुश हो किसी से तो ख़ुदा भी मुस्कुरा देता है
कर के दीदार-ए-नज़र तुम सारे ज़माने को ख़ुशी कर

गहरे ज़ख्म का जायका हर किसी के नसीब में नहीं होता
ये नसीब तुम्हें ख़ुदा ने बख़्शा है तू इसे जी औ" मस्ती कर

न हो सके कोई तुझ से छोटा औ" न तुम रहो किसी से बड़ा
करना हो तो ज़माने में तुम "धरम" ऐसी अपनी हस्ती कर 

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