Tuesday, 7 June 2016

समझ बैठे थे

हम तो तेरे ज़ुल्फ़ को ही दामन-ए-यार समझ बैठे थे
औ" तेरे आरिज़ को ही बोसा-ए-रुख़सार समझ बैठे थे

हमें तो धोखा हुआ था कि हम तुझे दिलदार समझ बैठे थे
औ" महज उन चंद मुलाकातों को ही प्यार समझ बैठे थे

जो नज़र का चिराग जला तो हम तुम्हें यार समझ बैठे थे
औ" वो बस तेरी एक नज़र को ही हम दीदार समझ बैठे थे

वो तेरी दिल बहलाने वाली बातों को हम क़रार समझ बैठे थे
हाय! तुम सा कुलूख को "धरम" हम माहपार: समझ बैठे थे

शब्दार्थ
आरिज़ - गाल
बोसा-ए-रुख़सार - चूमने वाला गाल
कुलूख - ढेला, मिट्टी का टुकड़ा
माहपार: - चाँद का टुकड़ा



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