Friday, 12 June 2026

बेचैनी वैसी की वैसी ही रही

आँखों में झाँको तो सिर्फ़ दहशत नज़र आती है
यहाँ से वहाँ तक बस भागने की ख़बर आती है

यह मुसीबत फ़क़त कोई मौजूदा दौर का नहीं  
माज़ी के हरेक लम्हें में यह सज-सँवर आती है

मौजों को उरूज तक जाने दो बीच में न टोको 
ज़रा देखो तो सही बलंदी किस-क़दर आती है

अपनी बात भी अपने कानों तक नहीं पहुँचती
तहज़ीब से की गई हर बात बे-असर आती है

बैठना उठना चलना यूँ मुसलसल चलता रहा
गद्दी हर किसी के कब्जे में मुख़्तसर आती है

दिल को ग़र खोदोगे तो मलवा निकल आएगा
उन लम्हों के याद आने से आँखें भर आती है

कि इस बार भी बेचैनी वैसी की वैसी ही रही   
आँखों में नींद "धरम" कब वक़्त-पर आती है