Thursday, 19 January 2017

मंज़िल-ए-मक़सूद के आगे भी

ज़हन्नुम के हक़ीकत का अंदाज़ा घर बैठे लगाने लगे हैं
की ठंढे पानी से लोग अब यहाँ मोम पिघलाने लगे हैं

बज़्म-ए-उल्फ़त में लोग खूब रंज-ओ-ग़म गाने लगे हैं
की जो निकले थे नेकी को वो यहाँ रंजिश पकाने लगे हैं

बात एक छोटी सी थी मगर क़त्ल-ए-आम कुछ यूँ बरपा
की यहाँ लोगों के साथ अब जानवर भी चिल्लाने लगे हैं

बात सिर्फ एक कदम लड़खड़ाने की थी नतीजा यूँ हुआ
की ना-उम्मीदी जहन में अब हर ओर से आने लगे हैं

वक़्त कदम-कदम पर तबज्जो भी खूब बदल देता है
की कई नए क़रीब आए कई पुराने दूर जाने लगे हैं

इन्सां ख्वाइशों के उलझन में कुछ यूँ फंस गए हैं "धरम"
की मंज़िल-ए-मक़सूद के आगे भी कदम बढ़ाने लगे हैं 

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