1.
तेरे बज़्म में "धरम" मुझे कुछ इस तरह सजा दी गई
की मैं बोलने लगा तो शम्मा-ए-महफ़िल बुझा दी गई
2.
ऐ! ज़िन्दगी तू रेत का महल फिर न बना
अपने मुक़्क़र्र कब्र में रह हाथ-पैर न बढ़ा
3.
किसी और का दर्द "धरम" अपने सीने में उतार लिया
ऐ! मौत मैंने फिर तुझसे अपनी ज़िन्दगी उधार लिया
4.
जिसे समझ था उल्फत "धरम" हक़ीकत में वो एक ख्वाब था
तेरे बज़्म में आना बस उसका चुकाना एक पुराना हिसाब था
5.
जब भी मंज़िल की ओर चला "धरम" फ़ासला और बढ़ता ही गया
की मुक़द्दर ज़मीं पर रेंगता रहा औ" हौसला हवा में उड़ता ही गया
6.
हस्र-ए-ज़िन्दगी "धरम" अब तो इस मुक़ाम पर है
जो लब खुले तो सिर्फ निकलती दुआ जुबान से है
7.
जो गर्क-ए-दरिया से निकल तो अब किनारा नहीं ढूंढता
मैं अपने ज़ीस्त में "धरम" अब कोई सहारा नहीं ढूंढता
8.
जो रखते हो दिल माथे में तो सीने में दिमाग भी रखो
की अपने हिस्से में "धरम" कुछ चीज़ नायाब भी रखो
9.
तेरी इस आह! पर "धरम" लब खामोश रहे दिल फट गया
फ़ासला-औ-नज़दीकी के दरम्यां जो भी था वो मिट गया
तेरे बज़्म में "धरम" मुझे कुछ इस तरह सजा दी गई
की मैं बोलने लगा तो शम्मा-ए-महफ़िल बुझा दी गई
2.
ऐ! ज़िन्दगी तू रेत का महल फिर न बना
अपने मुक़्क़र्र कब्र में रह हाथ-पैर न बढ़ा
3.
किसी और का दर्द "धरम" अपने सीने में उतार लिया
ऐ! मौत मैंने फिर तुझसे अपनी ज़िन्दगी उधार लिया
4.
जिसे समझ था उल्फत "धरम" हक़ीकत में वो एक ख्वाब था
तेरे बज़्म में आना बस उसका चुकाना एक पुराना हिसाब था
5.
जब भी मंज़िल की ओर चला "धरम" फ़ासला और बढ़ता ही गया
की मुक़द्दर ज़मीं पर रेंगता रहा औ" हौसला हवा में उड़ता ही गया
6.
हस्र-ए-ज़िन्दगी "धरम" अब तो इस मुक़ाम पर है
जो लब खुले तो सिर्फ निकलती दुआ जुबान से है
7.
जो गर्क-ए-दरिया से निकल तो अब किनारा नहीं ढूंढता
मैं अपने ज़ीस्त में "धरम" अब कोई सहारा नहीं ढूंढता
8.
जो रखते हो दिल माथे में तो सीने में दिमाग भी रखो
की अपने हिस्से में "धरम" कुछ चीज़ नायाब भी रखो
9.
तेरी इस आह! पर "धरम" लब खामोश रहे दिल फट गया
फ़ासला-औ-नज़दीकी के दरम्यां जो भी था वो मिट गया
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