Monday, 3 April 2017

आँखें

कि रात भर कोई भी ख़्वाब देखने से डराती हैं आँखें
औ" दिन भर हर हक़ीकत से नज़रें चुराती हैं आँखें

न जाने कैसे-कैसे अंदाज़ में ये दिल दुखाती हैं आँखें
औ" होकर नम न जाने किस-किस को बुलाती हैं आँखें

कहीं मिलाकर नज़र से नज़र प्यास बुझाती हैं आँखें
औ" कहीं पशेमाँ होकर भी क्या खूब पिलाती हैं आँखें

तेरे बज़्म में न जाने कितने रंग दिखाती हैं आँखें
कि किसी को हँसाती तो किसी को रुलाती हैं आँखें

सारे ग़मों से रिश्ता कुछ इस क़दर निभाती हैं आँखें
कि पीकर पूरा समंदर 'धरम' हर दर्द छुपाती हैं आँखें

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