Tuesday, 25 April 2017

वो अँधेरे में आ गया

जो तुमने डाल दी रौशनी तो वो अँधेरे में आ गया
कि उजड़े हुए गुलसन पर एक और क़हर ढा गया

दिल जला ज़िस्म भी जला औ" राख़ हो गई सारी यादें
कि उस गर्दिश-ए-अय्याम को उसका चेहरा भा गया

जो दो रूहों की पैदाईश थी उसे दो ज़िस्म ने मार डाला
कि रूह का इस तरह मिटना सब के ज़हन में छा गया

मुर्दा जिस लाठी पर अपना ज़िस्म तौल लेता था 'धरम'
कि ज़माना उस सहारे को बस सेहत के लिए खा गया

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