एक दरिया सुकूँ का हो
और मैं उसमें बह जाऊँ
किनारा बीच और फिर किनारा
इस एहसास से परे
ज़िंदगी के कुछ लम्हों का सफर
ऐसा भी हो
कि दरिया पार भी कर जाऊँ
और पता भी न चले
कोई हलचल नहीं न ही कोई शोर
एक समान चाल एक लय एक ही रंग
होश-ओ-हवास खोकर
पहलू में सर रखूं
चिर निद्रा की चादर ओढूँ
खुद को खो जाऊँ सो जाऊँ
और मैं उसमें बह जाऊँ
किनारा बीच और फिर किनारा
इस एहसास से परे
ज़िंदगी के कुछ लम्हों का सफर
ऐसा भी हो
कि दरिया पार भी कर जाऊँ
और पता भी न चले
कोई हलचल नहीं न ही कोई शोर
एक समान चाल एक लय एक ही रंग
होश-ओ-हवास खोकर
पहलू में सर रखूं
चिर निद्रा की चादर ओढूँ
खुद को खो जाऊँ सो जाऊँ
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