Sunday, 19 November 2017

एक दरिया सुकूँ का हो

एक दरिया सुकूँ का हो
और मैं उसमें बह जाऊँ
किनारा बीच और फिर किनारा
इस एहसास से परे
ज़िंदगी के कुछ लम्हों का सफर
ऐसा भी हो
कि दरिया पार भी कर जाऊँ
और पता भी न चले

कोई हलचल नहीं न ही कोई शोर
एक समान चाल एक लय एक ही रंग
होश-ओ-हवास खोकर
पहलू में सर रखूं
चिर निद्रा की चादर ओढूँ
खुद को खो जाऊँ सो जाऊँ

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