Wednesday, 25 October 2017

ज़िंदगी के फ़ासले पर मेरी पज़ीराई है

ऐ! ज़िंदगी तू कितने हिस्सों में कट-कट कर मेरे पास आई है
ये बता ऐसा क्यूँ है कि जो भी कोई मेरे क़रीब है वो हरजाई है 

ख़्वाब का पुलिंदा हर रात मेरे सिरहाने आकर लौट जाता है
ये बात क्या है कि मेरे आखों में कभी नींद क्यूँ नहीं आई है

मेरी रूह मेरी साँसें औ" मेरा पूरा ज़िस्म ये सब तुम्हारे ही हैं 
ऐ! मेरी मोहब्बत कि बाद इसके तू क्यूँ ख़ुद ही से शरमाई है

मैं कहाँ हूँ इसपर क्या कहूँ तुझसे कि वो बस एक ही बात है
मैं जहाँ हूँ वहाँ से पूरी ज़िंदगी के फ़ासले पर मेरी पज़ीराई है

ये तेरी हुस्न-ए-सल्तनत है यहाँ तो हर कोई तेरा ग़ुलाम है
कि बाद इसके भी क्यूँ तेरे दिल में अब भी सिर्फ तन्हाई है 

कि 'धरम' इस ज़िंदगी के बारे में मुझे और कहना ही क्या है 
मैं उसे देखूं या कि उसके अक्स को दिखती सिर्फ बेवफ़ाई है

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