1.
कि हमने जिसको जिया था वो ज़िंदगी कोई और थी
वहां खुदा कोई और था 'धरम' वो बंदगी कोई और थी
2.
कि क्यूँ कर न मेरी ज़ुबाँ ही खुलती है 'धरम' औ" न ही मेरा चेहरा बोलता है
मोहब्बत ये तेरी कैसी मेहरबानी है कि अब मुझको तो ग़म भी न मिलता है
3.
हर बार बस यहीं सोचता हूँ कि इस सफर के बाद अब कोई सफर न हो
क्यूँ भूल जाता हूँ "धरम" कि ग़र सफर न हो तो ज़िंदगी का बसर न हो
4.
कि जहाँ से याद था राह-ए-ज़िंदगी अब वहीँ से रास्ता भूल गया हूँ मैं
ऐ 'धरम' मुझे अब मुकाम-ए-ज़िंदगी के ठोकरों की कोई परवाह नहीं
5.
ज़ुबाँ की बेज़ुबानी अब भी है कोई छुपी कहानी अब भी है
कि तुझमें "धरम" कहीं कोई खामोश बेईमानी अब भी है
6.
जिस रात की कोई सुबह नहीं उस रात के बीतने का इंतज़ार ही क्यूँ
ये जानकर भी "धरम" सूरज की पहली किरण के तलबगार ही क्यूँ
कि हमने जिसको जिया था वो ज़िंदगी कोई और थी
वहां खुदा कोई और था 'धरम' वो बंदगी कोई और थी
2.
कि क्यूँ कर न मेरी ज़ुबाँ ही खुलती है 'धरम' औ" न ही मेरा चेहरा बोलता है
मोहब्बत ये तेरी कैसी मेहरबानी है कि अब मुझको तो ग़म भी न मिलता है
3.
हर बार बस यहीं सोचता हूँ कि इस सफर के बाद अब कोई सफर न हो
क्यूँ भूल जाता हूँ "धरम" कि ग़र सफर न हो तो ज़िंदगी का बसर न हो
4.
कि जहाँ से याद था राह-ए-ज़िंदगी अब वहीँ से रास्ता भूल गया हूँ मैं
ऐ 'धरम' मुझे अब मुकाम-ए-ज़िंदगी के ठोकरों की कोई परवाह नहीं
5.
ज़ुबाँ की बेज़ुबानी अब भी है कोई छुपी कहानी अब भी है
कि तुझमें "धरम" कहीं कोई खामोश बेईमानी अब भी है
6.
जिस रात की कोई सुबह नहीं उस रात के बीतने का इंतज़ार ही क्यूँ
ये जानकर भी "धरम" सूरज की पहली किरण के तलबगार ही क्यूँ
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