कि तेरी नज़र में रहकर भी मैं कभी तेरा नहीं हुआ
क्यूँ एक भी बार मेरी ज़िंदगी में कोई सवेरा नहीं हुआ
तेरे हर लफ्ज़ में उलझन थी औ" थी हर नज़र पशेमाँ
तू ये कैसी दरिया है जिसका कोई किनारा नहीं हुआ
जाम के सहारे यारों कभी हम भी चलते तो थे मगर
रुख़्सत-ए-जाम के बाद कभी कोई सहारा नहीं हुआ
कि ख़ुद अपनी गलतियों का अब क्या हिसाब करूँ
जब सही फैसले पर भी मेरा कहीं गुज़ारा नहीं हुआ
उजड़े हुए गुलसन पर ख़ुद क़त्ल कर तो दी ज़िंदगी
क्या कहें "धरम" कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ
क्यूँ एक भी बार मेरी ज़िंदगी में कोई सवेरा नहीं हुआ
तेरे हर लफ्ज़ में उलझन थी औ" थी हर नज़र पशेमाँ
तू ये कैसी दरिया है जिसका कोई किनारा नहीं हुआ
जाम के सहारे यारों कभी हम भी चलते तो थे मगर
रुख़्सत-ए-जाम के बाद कभी कोई सहारा नहीं हुआ
कि ख़ुद अपनी गलतियों का अब क्या हिसाब करूँ
जब सही फैसले पर भी मेरा कहीं गुज़ारा नहीं हुआ
उजड़े हुए गुलसन पर ख़ुद क़त्ल कर तो दी ज़िंदगी
क्या कहें "धरम" कि वो क़त्ल भी हमारा नहीं हुआ
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.